ऐसा वैज्ञानिक मिलना दुर्लभ है जो अपनी आलोचनात्मक सोच की मदद से न केवल अपने विषय क्षेत्र में बल्कि पूरे विज्ञान समुदाय में सुधार लाने का प्रयास करता है। हाल ही में भारतीय विज्ञान समुदाय ने एक ऐसे व्यक्ति को खो दिया। २५ अक्टूबर को, रोहिणी गोडबोले के निधन की ख़बर ने हमें गहरी हानि का एहसास कराया। हम thelifeofscience.com के संपादकों के लिए रोहिणी, प्रेरणा और अंतर्दृष्टि का एक अद्वितीय स्रोत थीं। भारत में विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं के लिए रोहिणी जितना काम बहुत कम लोगों ने किया है। इसलिए हमारे दिल और दिमाग़ में उनके लिए एक विशेष स्थान था।
आज भी—जो उनका ७२वाँ जन्मदिन होने वाला था—लोग उनको और उनके काम को श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
उनकी बेमिसाल किताब लीलावतीज़ डॉटर्स में उन्होंने अपना परिचय इस प्रकार दिया था—“मैं कण भौतिकी (high energy या particle physics) की फ़ेनोमेनोलॉजी के क्षेत्र में शोध करती हूँ, जिसमें प्रकृति के मूलभूत खंडों और उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है।” शायद वह चाहतीं कि उन्हें इसी तरह याद किया जाए—विज्ञान के प्रति उनका प्रेम सबसे आगे रखकर। मगर उन्होंने इसके अलावा भी दुनिया को बहुत कुछ दिया।
एक भौतिक विज्ञानी का सफ़र शुरू
रोहिणी ने अपनी स्कूली शिक्षा पुणे से पूरी की। उस छोटी उम्र से ही वह बदलाव पर ज़ोर देने लगी थीं। ‘मेरे स्कूल में पेश करने लायक़ कुछ सुधार’ (एनसीबीएस अभिलेखागार के माध्यम से गीता चड्ढा द्वारा प्राप्त) शीर्षक पत्र में उन्होंने अपने स्कूल के पाठ्यक्रम में ‘सामान्य विज्ञान’ की तुलना में ‘गृह विज्ञान’ के प्राधान्य का विरोध किया। “मैं यह मानती हूँ कि लड़कियों को अच्छी गृहिणी बनने के लिए गृह विज्ञान की जानकारी होनी चाहिए। मगर मेरे निजी अनुभव में, इससे हाई स्कूल छात्रवृत्ति परीक्षा (scholarship examination) में रुकावटें पैदा होती हैं,” छात्रा ने लिखा। “मैं यह सुझाव नहीं देती कि गृह विज्ञान पढ़ाया नहीं जाये, लेकिन सामान्य विज्ञान भी पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि छात्रायें भी हाई स्कूल छात्रवृत्ति और एसएससी परीक्षाओं के लिए समान स्तर की तैयारी कर सकें।”
भौतिक विज्ञान के प्रति अपने प्यार का इज़हार करते हुए, वह एक के बाद एक छात्रवृत्तियां जीतती गईं। रास्ते में एक आकर्षक, हाई-सैलरी बैंकिंग नौकरी से बचकर १९७४ में कण भौतिकी में अपना शोध शुरू करने के लिए वह स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यू यॉर्क, स्टोनी ब्रुक पहुंचीं। उसी साल कण भौतिकी के क्षेत्र में ‘नवंबर क्रांति’ हुई थी—सिद्धांत और प्रयोग द्वारा समर्थित कई खोजों और परिवर्तनों का नतीजा यह निकला कि ‘स्टैण्डर्ड मॉडल ऑफ़ पार्टिकल फ़िज़िक्स’ को प्रकृति के एक मौलिक सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया गया।
उन्होंने भारतीय हाई एनर्जी फ़िज़िक्स के लिए उतना ही किया जितना विज्ञान में भारतीय महिलाओं के लिए किया।
‘स्टैण्डर्ड मॉडल’ पदार्थ के निर्माण खंडों को प्रकृति के मूलभूत बलों से जोड़ता है और मानता है कि ब्रह्मांड १७ उपपरमाण्विक कणों से बना है। ऐसे कणों और बलों का जटिल पारस्परिक संबन्ध रोहिणी की ज़िंदगी भर की रुचि का विषय बनने वाला था।
रोहिणी एक भौतिक विज्ञानी के तौर पर उस वातावरण में पली बढ़ी जहां ‘स्टैण्डर्ड मॉडल’ स्थापित हो रहा था। जब २०२१ में ‘स्टैण्डर्ड मॉडल’ के मुख्य सिद्धांतकारों में से एक स्टीवन वाइनबर्ग गुज़र गए, रोहिणी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए यह वर्णन किया कि उनके “मैथेमैटिकली ब्यूटीफ़ुल” और सम्मोहक सिद्धांत कैसे समकालीन प्रयोगों से भी संबंधित हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि वाइनबर्ग के काम ने उस समय के कितने युवा कण भौतिकीविदों को प्रभावित किया था। रोहिणी उनमें से एक थीं।
मगर विज्ञान में रोहिणी का जीवन ‘स्टैण्डर्ड मॉडल’ से कहीं आगे तक गया। हालाँकि यह मॉडल बहुत कुछ व्याख्या करता है, लेकिन आज भी भौतिकी में कुछ ऐसी खुली पहेलियों हैं जिनका कोई सुराग ‘स्टैण्डर्ड मॉडल’ नहीं देता—जैसे कि डार्क मैटर, जिसके अध्ययन में रोहिणी की ख़ास दिलचस्पी थी। जब ‘स्टैण्डर्ड मॉडल’ का एक कण, मॉडल की भविष्यवाणी से अधिक भारी पाया गया, तो रोहिणी ने द टेलीग्राफ को बताया—“एक अर्थ में, हम सभी लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर या कहीं और से ‘स्टैण्डर्ड मॉडल फ़िज़िक्स’ से परे किसी और भौतिकी का सबूत पाने की उम्मीद में थे।” रोहिणी की ख़ास दिलचस्पी ‘सूपरसिमेट्री’ नाम के एक सैद्धांतिक ढाँचे में थी, जो अपने ख़ुद के सैद्धांतिक कणों (theorized particles) के आधार पर काम करता है। और सही मायने में इस विषय पर पाठ्यपुस्तक भी रोहिणी ने ही लिखी (मैन्युएल ड्रीज़ और प्रबीर रॉय के साथ) जिसके द्वारा कई छात्रों और युवा सहयोगियों के लिए यह क्षेत्र खुल गया।
अपने वैज्ञानिक शोध में उनकी नज़र अगली पीढ़ी के पार्टिकल कोलाइडर्स —जैसे कि बहू-चर्चित इलेक्ट्रॉन-पॉज़िट्रॉन कोलाइडर—पर टिकी थी। वह चाहती थीं कि भारत का भौतिक विज्ञानी समुदाय विज्ञान के इन बड़े वैश्विक प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभाए। इस प्रकार, उन्होंने भारतीय हाई एनर्जी फ़िज़िक्स के लिए उतना ही किया जितना विज्ञान में भारतीय महिलाओं के लिए किया। वह अक्सर यह पक्ष लेती थीं कि भौतिक विज्ञान को ‘स्टैण्डर्ड मॉडल’ के परे ले जाने के प्रयास में भारतीय वैज्ञानिक समुदाय को अंतरराष्ट्रीय और भारतीय दोनों स्तर के प्रयोगों के सहारे, भाग लेना चाहिए।

सर्न में रोहिणी के साथ अर्चना (स्रोत: अर्चना शर्मा)
‘ड्रीज़-गोडबोले इफ़ेक्ट’
हमेशा की तरह, हमारे फ़ील्ड की रीति को मानते हुए, हमारे नामों के पहले अक्षरों के अनुसार उनका क्रम तय हुआ। पर हमारे फ़ील्ड में हर कोई जानता है कि इसका मतलब यह नहीं कि मैंने अधिक योगदान दिया था। सही मायने में, हम दोनों का योगदान बराबर था।—‘ड्रीज़-गोडबोले इफ़ेक्ट’ पर रोहिणी के कोलेबोरेटर मैनुअल ड्रीज़
रोहिणी की कई अहम वैज्ञानिक साझेदारियाँ सिद्धांतकार और मित्र मैनुअल ड्रीज़ के साथ रहीं, जो फ़िलहाल जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय में काम करते हैं। एक ईमेल में मैनुअल ने रोहिणी के साथ उनकी लंबी दोस्ती और सहयोग के बारे में बताया। उनकी पहली मुलाक़ात १९८६ में जर्मनी के डॉर्टमंड में हुई थी, जहां मैनुअल ने हाल ही में अपनी पीएचडी पूरी की थी।
“उस समय हमने साथ काम करना शुरू नहीं किया था, पर मुझे याद है कि उन्होंने शुरू से ही मेरे साथ बराबरी का सलूक किया। मेरे लिए यह एक अनोखा अनुभव था। मैं इस बात से खुश था कि मुझसे काफ़ी वरिष्ठ होने के बावजूद उन्होंने मुझको अपना बराबर समझा; बाद में हमारे बीच यह स्वाभाविक हो गया,” मैनुअल ने स्नेह से रोहिणी को याद करते हुए कहा।
वर्षों बाद, रोहिणी और मैनुअल ने अपनी गणनाओं के वर्णन द्वारा (describing their mathematical calculations) हाई एनर्जी पार्टिकल कोलाइडर्स के अंदर उप-परमाणु कणों की परस्पर क्रिया को थ्योराइज़ करना शुरू किया। रिसर्च पेपरों के एक लंबे सिलसिले के द्वारा उन्होंने स्ट्रॉंग इंटरेक्शन फ़िज़िक्स में एक नये ‘इफ़ेक्ट’ का वर्णन किया, जिसे अक्सर ‘ड्रीज़-गोडबोले इफ़ेक्ट’ कहा जाता है। “हमेशा की तरह, हमारे फ़ील्ड की रीति को मानते हुए, हमारे नामों के पहले अक्षरों के अनुसार उनका क्रम तय हुआ। पर हमारे फ़ील्ड में हर कोई जानता है कि इसका मतलब यह नहीं कि मैंने अधिक योगदान दिया था। सही मायने में, हम दोनों का योगदान बराबर था।” मैनुअल ने समझाया।
जब फोटॉन में हैड्रॉन की तरह बर्ताव करने की छिपी संभावना बहार निकलती है तब उसको ‘ड्रीज़-गोडबोले इफ़ेक्ट’ कहते है। मैनुअल ने इसे फोटॉन की हैड्रॉनिक ‘कॉनटेंट’ का नाम दिया। “मौलिक रूप से, एक इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक फील्ड में आवेशित (charged) उप-परमाणु कणों की परस्पर क्रिया में एक फोटॉन एक हैड्रॉन की तरह बर्ताव कर सकता है,” मैनुअल ने इस ‘इफ़ेक्ट’ का वर्णन करते हुए कहा। हैड्रॉन्स रसायन विज्ञान या जीव विज्ञान में अणुओं के समान उप-परमाणु कणों की मिश्रित संरचनाएं हैं। उदाहरण के लिए, एक प्रोटॉन (जो एक परमाणु के न्यूक्लीअस के अंदर पाया जाता है और ‘क्वार्कस’ से बना होता है) एक प्रकार का हैड्रॉन है। प्रकाश के वाहक के रूप में प्रसिद्ध फोटॉन की किसी भी दिशा में कोई लंबाई नहीं होती, लेकिन यह उप-परमाणु कणों के बीच परस्पर क्रिया का बल-वाहक है। और यह “हैड्रॉन की तरह बर्ताव” अक्सर नहीं करता।
अपनी सैद्धांतिक गणनाओं में रोहिणी और मैनुअल ने देखा कि जब एक फोटॉन के ‘हैड्रॉनिक कॉनटेंट’ में प्रवेश किया जाता है, तब इसकी दूसरे हैड्रोंस के साथ परस्पर क्रिया प्रबल हो जाती है।
“नतीजा यह है कि फ़ोटोंस और हैड्रॉन्स की परस्पर क्रिया में (जैसा कि लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर जैसे पार्टिकल कोलाइडर्स में अध्ययन किया गया है), फोटॉन के हैड्रॉनिक अंश का योगदान अक्सर फोटॉन की साधारण परस्पर-क्रिया के योगदान के बराबर, या उससे भी ज़्यादा प्रभावशाली होता है,” मैनुएल ने कहा।
१९९० के दशक की शुरुआत में, एक पेपर में रोहिणी और मैनुअल ने दिखाया कि यह ‘फोटॉन का हैड्रॉनिक अंश’ उस समय के बहू-चर्चित ‘लीनियर कोलाइडर’ पर अपेक्षाकृत कम ऊर्जा के ‘पायोन्स’ (pions, हैड्रॉन में सबसे हल्का कण) के उत्पादन की बहुत अधिक संभावना पैदा करता है। मैनुअल ने बताया, “असल में, लीनियर कोलाइडर के लिए सुझाए गए कुछ डिज़ाइनों में, इस गतिविधि के साथ साथ दूसरी प्रतिक्रियाएँ भी होंगी जिससे बहुत अधिक ऊर्जावान कण उत्पादित होंगे। कम ऊर्जा वाले ‘पायोन्स’ की इस पृष्ठभूमि से, मुख्य वैज्ञानिक घटना के दिलचस्प हिस्सों की व्याख्या करना और ज़्यादा मुश्किल हो जाएगा।” ऐसा लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में अक्सर होता है और इससे प्रयोगकर्ताओं के लिए बहुत बड़ी परेशानी खड़ी हो जाती है।
यह काम भविष्य की पीढ़ी के कोलाइडर्स से कैसे संबंधित है, इस पर टिप्पणी करते हुए रोहिणी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि पार्टिकल कोलाइडर्स की अगली पीढ़ी को “डिज़ाइन के चरण में ही ‘फोटॉन इंटरेक्शन फैक्टर’ को ध्यान में रखना होगा, ताकि वह कोलाइडर्स सटीक भौतिक अध्ययन कर सकें।”
उन्होंने कहा था, “हमें उम्मीद है कि हमारी केस स्टडीज़ और एप्रोक्सिमेशन स्कीम्ज़, लीनियर कोलाइडर के डिज़ाइन को और अधिक ऑप्टिमाइज़ करने में मदद करेंगी।”
“रोहिणी को हमेशा सुना जा सकता है”
“किसी ने कहा है कि रोहिणी दिखने से पहले सुनी जाती थी और यह बिलकुल सच है!”—चयनिका शाह
उनके निधन पर शोक मनाने वालों में CERN, जिनेवा (स्विटज़रलैंड) में उनके दोस्त और सहकर्मी शामिल हैं। CERN वह संस्था है जहां लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर स्थापित है, जिसमें २०१२ में प्रसिद्ध ‘हिग्स बोज़ौन’ का आविष्कार हुआ था। रोहिणी अक्सर CERN जाती थीं और उन्होंने वहां कई परियोजनाओं और चर्चाओं में योगदान दिया था।
CERN की भौतिक विज्ञानी अर्चना शर्मा ने कई बार रोहिणी के साथ मिलकर काम किया। एक ईमेल में, अर्चना ने रोहिणी के निधन पर अपना दुख साँझा किया—“रोहिणी गोडबोले एक असाधारण भौतिक विज्ञानी और कई लोगों की प्रिय मित्र थीं। रोहिणी की CERN की यात्राएँ एक तरफ़ सैद्धांतिक भौतिकी में उनकी गहन विशेषज्ञता और दूसरी तरफ़ उनके जीवंत व्यक्तित्व और गर्मजोशी से परिपूर्ण थीं।”
उन्होंने आगे कहा, “मैं जब भी उनसे बातचीत करती थी, उनके विशाल ज्ञान और कण भौतिकी की जटिलताओं को सुलझाने के जुनून को देखकर आश्चर्यचकित रह जाती थी। CERN की यात्राओं के दौरान, उन्होंने कई परियोजनाओं में अहम योगदान दिया और कण भौतिकी के सैद्धांतिक ढाँचों के बारे में हमारी समझ को प्रभावित किया। उनकी अंतर्दृष्टि ने हमारे शोध की सीमाओं को आगे बढ़ाने में मदद की और उनकी उपस्थिति ने वैज्ञानिक समुदाय को प्रोत्साहित किया।”
रोहिणी को श्रद्धांजलि देते वक़्त, अर्चना समेत कई लोगों ने उनकी जोशीली और उत्साह से भरपूर आवाज़ का ज़िक्र किया है—जिससे लोग अक्सर चौंक जाते थे क्योंकि उनका क़द अपेक्षाकृत छोटा था। शिक्षिका, शोधकर्ता और समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ता चयनिका शाह ने, ट्रिएस्ट में रोहिणी से अपनी पहली मुलाक़ात को याद करते हुए सोशल मीडिया पर उनको हार्दिक श्रद्धांजलि दी। उन्होंने लिखा, “किसी ने कहा है कि रोहिणी दिखने से पहले सुनी जाती थी और यह बिलकुल सच है!”
चयनिका ने आगे कहा, “वह आईआईटी बॉम्बे में मेरे विभाग में सीनियर थी। जैसा कि अक्सर लड़कों से भरी कक्षा में उस एक ‘गीकी’ लड़की के साथ होता है, उसके बारे में भी कई कहानियाँ बताई जाती थीं, ख़ासकर यह कि भौतिकी में वह कितनी तेज़ है।” जब यह दो भौतिक विज्ञान प्रेमी आख़िरकार मिले तो वह अच्छे दोस्त बन गए।

लगभग 40 साल पहले ज़ुब्लज़ाना में एक युवा रोहिणी और चयनिका (स्रोत: चयनिका शाह)
“हमारे नारीवाद कुछ मुद्दों पर मिलते थे, दूसरे मुद्दों पर बहुत अलग थे। विज्ञान के प्रति हमारी समझ और प्रेम ने भी अलग-अलग रास्ते अपनाए। मैं कॉलेज शिक्षिका थी और वह थी वरिष्ठ वैज्ञानिक। आज पूरे दिन, [मैं] स्नेह और दुःख के साथ उसके बारे में सोचती रही। हम अक्सर समलैंगिक समुदायों पर लंबी बातचीत करते थे। उस संदर्भ में हाल ही में हम मित्रता के विषय में बात कर रहे थे—जब हम किसी ऐसे इंसान को जानते हैं जो हमारे जीवन का हिस्सा हों और दुनिया में बदलाव ला रहे हों, तो हमें कितना अच्छा महसूस होता है, और उनको अपने साथ पाकर हम कितना समृद्ध होते हैं, चाहे वह कम समय के लिए ही क्यों न हो। रोहिणी, तुम वह दोस्त हो जिसने मेरे जीवन को समृद्ध किया। काश तुम्हें और समय मिलता।” चयनिका ने लिखा।
रोहिणी की मित्रता और साझेदारी ने कई वैज्ञानिक फल पैदा किए हैं। जब मैनुअल अपनी पहली पोस्ट-डॉक्टरल फ़ेलोशिप के लिए मैडिसन, यूएसए गए, तो उन्होंने रोहिणी को कण भौतिकी में वरिष्ठ शोधकर्ताओं द्वारा आयोजित एक अनोखे विज्ञान-सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। यह एक ऐसी बैठक थी जहां उपस्थित लोग खुले प्रश्नों पर एक साथ काम करते थे, न कि केवल पहले से किए हुए शोध पेश करते थे (जैसा कि ज़्यादातर विज्ञान-सम्मेलनों में होता है)। मैनुअल बताते हैं की रोहिणी को यह फॉर्मेट बहुत पसंद आया और भारत लौटने पर उन्होंने WHEPP (वर्कशॉप ऑन हाई एनर्जी फ़िज़िक्स फ़ेनोमेनोलॉजी) नाम से उसी प्रकार की कार्यशालाओं की एक सीरीज़ शुरू की। यह सीरीज़ आज भी जारी है—सबसे हाल की कार्यशाला इसी साल जनवरी में आईआईटी गांधीनगर में हुई थी।
१९९० और १९९७ के बीच, मैनुअल WHEPP में भाग लेने के लिए कई बार भारत आये थे। उन्होंने बताया कि लोग उनके लंबे क़द पर अक्सर टिप्पणी करते थे। “क़द के मामले में मैं रोहिणी का बिलकुल उल्टा था!” WHEPP कार्यशालाओं में से एक में ही किसी ने कहा था— “मैनुअल को हमेशा देखा जा सकता है, और रोहिणी को हमेशा सुना जा सकता है।”
मैनुअल के अनुसार, “इस टिप्पणी का दूसरा भाग रोहिणी के अदम्य व्यक्तित्व को दर्शाता है—कई मायनों में, विज्ञान का रास्ता उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनकी आवाज़, उनकी राय, हमेशा सुनी जाये!”
“रोहिणी एक बहुत अच्छी भौतिक विज्ञानी और बहुत अच्छी इंसान थी। मुझे उनकी बहुत याद आएगी,” मैनुअल ने साँझा किया।
रोहिणी और द लाइफ ऑफ़ साइंस
हम thelifeofscience.com के युवा ‘स्टेमिनिस्टों’ ने रोहिणी से बहुत कुछ सीखा। विज्ञान में विभिन्नता की कमी को लेकर वह सच में बहुत चिंतित थीं और उनकी टिप्पणियों में एक विशेष गंभीरता थी—हर कोई उनकी बात ध्यान से सुनता था। हमने हर बार उनसे कुछ न कुछ सीखा है। विज्ञान की ‘ecosystem’ को सभी के लिए समान बनाने की कठिन लड़ाई में हम उनके योगदानों को बहुत याद करेंगे।
वह हमेशा हमें अपना काम करने में प्रेरित करती थीं। जब हमने उनके साथ हमारी बच्चों के लिए किताब ‘31 फैंटास्टिक एडवेंचर्स इन साइंस’ साँझा की, तो रोहिणी ने एक प्यारा सा जवाब भेजा—“इत्तेफाक़ से, मैंने आपकी किताब एक छोटी लड़की को उपहार में दी थी और उसने पूछा कि उसकी माँ (जो ख़ुद भी एक वैज्ञानिक हैं) उसमें क्यों शामिल नहीं हैं। तो, आपका आगे का काम बिलकुल साफ़ है। इस शानदार किताब के लिए बधाई!”
विज्ञान के क्षेत्र को कैसे लैंगिक तौर पर समान बनाया जा सकता है इस पर रोहिणी के इतने ठोस विचार थे की वह सारे वर्णन करना कठिन है। उन्होंने दो अलग-अलग स्टडीज़ में हिस्सा लिया था। नीचे दिए गए उन स्टडीज़ के कुछ परिणाम ‘जेंडर गैप’ पर रोहिणी के सूक्ष्म दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।
रामकृष्ण रामास्वामी और रोहिणी गोडबोले का एक रिपोर्ट, “भारत में महिला वैज्ञानिक” (२०१८) का एक अंश—
- विज्ञान की पढ़ाई में और स्कूलों और अंडरग्रेजुएट कॉलेजों में विज्ञान शिक्षण में महिलाओं की काफ़ी भागीदारी है।
- मगर यह बात उन महिलाओं के लिए सच नहीं है जो वैज्ञानिक अनुसंधान को एक कैरियर के रूप में अपना रही हैं।
- जैसे जैसे वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग संस्थानों का कथित दर्जा, और पद की उच्चता बढ़ती है, वैसे ही शिक्षिकाओं और छात्राओं का प्रतिशत घटता है।
हमारी किताब, ‘लैबहौपिंग’ का एक अंश [स्रोत—कुरुप, ए., मैत्रेयी, आर., कंथाराजू, बी., और गोडबोले, आर. (२०१०), “प्रशिक्षित वैज्ञानिक महिला शक्ति (trained scientific women power): हम कितना खो रहे हैं और क्यों?”]—
- शोध के क्षेत्र में १४ प्रतिशत महिलाओं ने कभी शादी नहीं की, लेकिन सिर्फ़ २.५ प्रतिशत पुरुषों ने कभी शादी नहीं की।
- ८६ प्रतिशत पुरुष वैज्ञानिकों के मुक़ाबले ७४ प्रतिशत महिला वैज्ञानिकों के बच्चे हैं।
- शोध के क्षेत्र में महिलाओं का अधिक प्रतिशत हर सप्ताह ४०-६० घंटे काम पर बिताता है; पुरुषों का अधिक प्रतिशत हर सप्ताह ४० घंटे से कम समय काम पर बिताता है।
- अधिक महिलाओं ने जवाब दिया कि वह अपने वर्तमान वैज्ञानिक पदों को स्वीकार करते वक़्त flexible timing, बच्चों की देखभाल, परिवहन और आवास जैसे कारणों से प्रभावित हुई थीं। महिलाओं के मुक़ाबले अधिक पुरुषों ने बेहतर संभावनाओं के लिए पिछले पदों को छोड़ा था।
इन शोध कार्यों के अलावा, रोहिणी की किताब ‘लीलावतीज़ डॉटर्स’ ने भारतीय विज्ञान समुदाय को विज्ञान में महिलाओं के मुद्दों पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया। इसमें पहली बार विज्ञान के क्षेत्र में लगभग सौ भारतीय महिलाओं की जीवनियाँ और आत्मकथाएँ इकट्ठा की गईं।
यह कहानियाँ वाक़ई छिपी हुई थीं। अगर रोहिणी ने दूसरों के साथ मिलकर उन्हें इकट्ठा करने की कोशिश न की होती तो हम उन्हें कभी नहीं सुन पाते। इस किताब और युवा पाठकों के लिए इसके संस्करण ‘ए गर्ल्स गाइड टू ए लाइफ़ इन साइंस’ में शामिल एक वैज्ञानिक, प्रज्वल शास्त्री, एक खगोल भौतिकीविद हैं। इन निबंधों को प्रकाशित करने के सराहनीय प्रयास पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जब वह ‘राइटर्स ब्लॉक’ से झूझ रही थीं, तब रोहिणी के कोमल प्रोत्साहन से ही वह अपना निबंध पूरा कर पायीं।
२००८ में प्रिय शिक्षक/खिलौना निर्माता, अरविंद गुप्ता को स्वर्गीय डॉ. मंगला नार्लिकर ने यह पुस्तक उपहार में दी थीं। इससे प्रेरित होकर उन्होंने भारतीय वैज्ञानिकों पर अपनी खुद की एक किताब लिखने का काम शुरू किया। उन्हें याद है कि इस पुस्तक की दृष्टि से वे “विस्मित” हुए थे।
“[‘लीलावतीज़ डॉटर्स’] ऐसी पहली किताब थी जिसमें भारतीय महिला वैज्ञानिकों की कहानियाँ उनके अपने शब्दों में बताई गई थीं। मुझे किताब बहुत पसंद आयी। सारे निबंध एक जैसे नहीं थे—कुछ लेख लंबे थे, कुछ बहुत छोटे। हर एक का स्टाइल अलग था। इससे पुस्तक और ज़्यादा आकर्षक बनी,” उन्होंने कहा।
रोहिणी की विरासत को जीवित रखने की कोशिश में, अरविंद ने अब पुस्तक को हिंदी और मराठी में अनुवाद करने का जिम्मा उठाया है।
अरविंद कहते हैं—“‘लीलावतीज़ डॉटर्स’ का सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद करना बहुत ज़रूरी है। इसकी दो वजहें हैं—१. यह स्वर्गीय प्रोफ़ेसर रोहिणी गोडबोले के लिए सच्ची और स्थायी श्रद्धांजलि होगी। २. इससे भारत में महिला वैज्ञानिकों की भूमिका और योगदान को और ज़्यादा लोगों तक पहुँचाया जा सकेगा। मैं उम्मीद करता हूँ कि मैं इस परियोजना को सफ़ल बनाने में मदद कर सकूँगा।”
हममें से जो भी रोहिणी के कोमल मगर दृढ़ व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ है, उसके अंदर रोहिणी की सशक्त दृष्टि को आगे बढ़ाने की इच्छा पनप रही है। रोहिणी की स्मृति को उचित सम्मान देने के लिए हमें लंबे समय तक अपना प्रयास जारी रखना होगा।
नोट—आयशा पंजाबी ने इस निबंध के साथ प्रकाशित छवि का चित्रण किया है।
यह अनुवाद स्थिर भट्टाचार्य द्वारा किया गया था
