हमारे शीर्ष शिक्षण संस्थान जातिवाद के ज़ोर पर चल रहे हैं

दलित, बहुजन और आदिवासी पत्रकार, एकेडेमिक्स और कार्यकर्ताओं की एक ऑनलाइन चर्चा में एक बात साफ़ उभर कर आई—आधुनिक भारत के एकेडेमिया में जातिवाद न सिर्फ़ पनप रहा है, बल्कि यही उसकी मुख्य पहचान है

दलित, बहुजन और आदिवासी पत्रकार, एकेडेमिक्स और कार्यकर्ताओं की एक ऑनलाइन चर्चा में एक बात साफ़ उभर कर आईआधुनिक भारत के एकेडेमिया में जातिवाद न सिर्फ़ पनप रहा है, बल्कि यही उसकी मुख्य पहचान है    

सायंतन दत्त (टी.एल.ओ.एस. टीम के इनपुट के साथ) 

ट्रिगर वॉर्निंग—इस लेख में जातिवादी शोषण [casteist abuse] और आत्महत्या के उल्लेख हैं

This article was originally written in English and can be read here.

अप्रैल में इंटरनेट पर कुछ वीडियो सामने आये जिनमें आईआईटी खड़गपुर की एसोशिएट प्रोफेसर सीमा सिंह, एक ऑनलाइन क्लास के दौरान, विकलांग और/या वंचित जातियों के छात्रों को खुले आम गालियां देती हुई नज़र आयीं। कथित तौर पर इस अध्यापिका के दुराचार का कारण यह था कि कुछ छात्र ऑनलाइन क्लास में राष्ट्र-गीत के समय खड़े नहीं हुए थे और उनहोंने ‘भारत माता की जय’ नहीं कहा था। इसके अलावा, एक छात्र ने कोविड-19 से अपने दादाजी की मृत्यु होने के कारण, सिंह से छुट्टी का आवेदन भी किया था। दूसरे वीडियो में सिंह सबके सामने उस छात्र को फटकारती हैं और इस तरह के बर्ताव को “इंसानी दिमाग़ का अप्रयोग” [non-application of the human mind] का नाम देती हैं। वे आईआईटी खगड़पुर के अध्यापकों के सर्वशक्तिशाली होने का वर्णन करते हुए कहती हैं, “तुम लोग मुझे कुछ नहीं कर सकते।” यह याद रखना ज़रूरी है कि उपरोक्त घटनाएं आईआईटी के ‘प्रीपरेटरी कोर्स’ में हुईं, जो उन एससी, एसटी और पीडी पृष्ठभूमि के छात्रों को दिया जाता है, जिन्हें ‘कट ऑफ’ क्लियर करने के बावजूद सीट नहीं मिली। जो छात्र कोर्स पूरा करने में सफल होते हैं, उन्हें एक साल बाद दाख़िला मिल सकता है। मगर इस ‘सफलता’ को आंकने की शक्ति अध्यापक के हाथों में होती है।

 

इन वीडियों पर कई जाति-विरोधी संगठनों और आईआईटी के पूर्व छात्रों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। आईआईटी बॉम्बे के आंबेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्कल (APPSC) ने सिंह के हिंसक हरकतों की सार्वजनिक रूप से निंदा करते हुए उनकी बर्ख़ास्तगी की मांग की। उन्होंने यह मांग भी उठाई कि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Prevention of Atrocities Act) के तहत, सिंह के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया जाये और इस तरह के जातिवादी आचरण पर रोक लाने के लिए आईआईटीओं में जातिवादी भेदभाव-विरोधी ‘एससी, एसटी और ओबीसी सेल’ स्थापित किया जाये। आईआईटी खड़गपुर के निर्देशक को लिखे गए एक पत्र में आईआईटीओं के हज़ार से अधिक पूर्व छात्रों ने सिंह के व्यवहार पर अपनी घृणा व्यक्त की, और उनकी बर्ख़ास्तगी की मांग उठाई। ट्विटर पर #End_Casteism_In_IITs ट्रेंड करने लगा और कई जाति-विरोधी कार्यकर्ताओं ने APPSC द्वारा रखी गयी मांगों को बढ़ावा दिया। आईआईटी के पूर्व छात्रों में से 25 महिलाओं ने भी आईआईटी खड़गपुर के निर्देशक को चिट्ठी लिखी 

 

कुछ दिनों में सिंह ने माफ़ी मांगी और उनके कोविड-19 पॉजिटिव होने को और सामाजिक एकांत से पैदा होने वाले तनाव को अपने बर्ताव का कारण ठहरायाइस रिपोर्ट के लिखे जाने तक सिंह को निलंबित किया गया है और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत उनके ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया है। मगर यह ध्यान में रखना ज़रूरी है कि उन्हें बर्ख़ास्त नहीं किया गया है। और आईआईटी-केजीपी ने APPSC की बाक़ी मांगों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। 

 

भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति और जातिवाद प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूप से मजूद हैं। वंचित जातियों से आने वाले अध्यापकों और छात्रों को बार-बार, अलग-अलग तरीक़ों से जातिवाद का प्रभाव झेलना पड़ता है। जाति और जातिवाद भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में बहिष्करण तंत्रों (exclusionary mechanisms) को कैसे क़ायम रखते हैं, यह समझने के लिए TheLifeofScience.com ने मई 8, 2021 को लाइव वेबिनार पर एक चर्चा का आयोजन किया था। पूरी वेबिनार आप यहाँ देख सकते हैं |  

 

यह कोई नई घटना नहीं 

हालांकि सीमा सिंह के उदहारण ने लोगों का ध्यान खींचा है, यह याद रखना ज़रूरी है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी आईआईटी जैसे संस्थान में जातिवाद की घटना हुई हो। आईआईटी हैदराबाद की मानवशास्त्री (anthropologist) वैशाली खांडेकर ने सटीक बयान किया, “विश्वविद्यालयों में इस तरह के बहिष्करण तंत्र हमेशा उपस्थित रहे हैं। सीमा सिंह की घटना में नयापन बस इतना है कि यह ऑनलाइन हुई। उन्होंने जो शब्द कहे हैं, या जिन भावनाओं के आधार पर अपने विचार रखे हैं, वे बिलकुल भी नए नहीं हैं।” आईआईटी की घटना के कुछ ही हफ़्ते बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में सामाजिक विज्ञान के डीन और राजनीति विज्ञान के अध्यापक कौशल कुमार मिश्रा ने एक फेसबुक पोस्ट में वंचित जातियों से आने वाले डॉक्टरों पर उपहास किया। उन पर एफआईआर दर्ज किया गया है और उस मामले की जांच चल रही है।   

वेबिनार के दौरान पैनेलिस्टों ने गहरे दुःख के साथ वंचित जातियों के उन तमाम छात्रों की संस्थागत हत्याओं (institutional murders) का उल्लेख किया, जिन्होंने जातिगत शोषण (caste-based abuse) और भेदभाव में अपनी जान गंवाई हैं। 2014 में आईआईटी बॉम्बे के एक दलित विद्यार्थी, अनिकेत अंभोरे ने बिल्डिंग से कूद कर अपनी जान दे दी। यह साफ़ नहीं है कि अनिकेत की मृत्यु आत्महत्या थी या दुर्घटना, मगर उसके माता-पिता ने आरोप लगाया कि जातिगत उत्पीड़न (caste-based harassment) ने ही उसे आत्महत्या के चरम क़दम की तरफ़ धकेल दिया था। इस घटना के बाद आईआईटी बॉम्बे ने अनिकेत की मृत्यु की परिस्थितियों की जांच करने के लिए तीन सदस्यीय समिति नियुक्त की थी। इस समिति के निष्कर्ष कभी सार्वजनिक नहीं किये गए थे, लेकिन द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ समिति ने यह निष्कर्ष निकाला था कि मृत्यु का कारण जातिवादी शोषण नहीं, बल्कि अनिकेत का “अंतर्विरोध” (“internal contradictions”) था। मगर यह महत्वपूर्ण है कि समिति ने इतना स्वीकार किया कि “यह मुमकिन है कि सरकार की आरक्षण नीति के ख़िलाफ़ लोगों के सख़्त रवैये के कारण, एससी/एसटी कोटा से दाख़िला लेने वाले छात्रों को अपने हॉस्टेलों और विभागों में परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं।”

अनिकेत का मामला बहुतों में से एक है। उनमें से 2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित पीएचडी स्कॉलर रोहित वेमुला की मृत्यु की घटना सबसे सुपरिचित है। रोहित और उनके मित्र स्पष्ट रूप से जातिगत अत्याचार और सामाजिक बहिष्कार (social ostracisation) के शिकार थे, जिसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की एचसीयु-शाखा और विश्वविद्यालय प्रशासन दोनों का हाथ था। रोहित एक दर्द-नाक सुइसाइड नोट छोड़कर गए जिसमें वे लिखते हैं—“मेरा जनम मेरे लिए एक घातक हादसा है। अपने बचपन के अकेलेपन से मैं कभी उबर नहीं सका।” इस घटना के बाद भारत के शीर्ष कैंपसों में जातिगत भेदभाव की कई और भयानक घटनाएं सामने आयी हैं। जैसे कि एस अनीता (मेडिसिन की आकांक्षी (aspiring) विद्यार्थी), पायल ताड़वी (बीवाईएल नायर अस्पताल की रेज़ीडेंट डॉक्टर), मुथुकृष्णन (जेएनयू के रिसर्च स्कॉलर) और फ़ातिमा लतीफ (आईआईटी मद्रास की एम ए की विद्यार्थी) की आत्महत्याएं और नजीब अहमद (जेएनयू के एम एस सी के विद्यार्थी) का लापता होने की घटना। शीर्ष शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को कवर करने वाली पत्रकार मेकपीस सिटलहो ने मीडिया के लोगों से अपील की—“सिर्फ़ मृत्युओं पर रिपोर्ट मत कीजिये। लोगों के मरने के इंतज़ार में मत बैठे रहिये, मृत्यु तो निराशा का बिलकुल अंतिम चरण होता है। उससे पहले भी (जातिगत भेदभाव के मामलों का) फॉलो-अप (follow-up) कीजिये।”

 

वेबिनार के मॉडरेटर और जादवपुर विश्वविद्यालय के अध्यापक शुभजित नस्कर ने इस बात पर ज़ोर डाला कि आधुनिक युग में जातिगत भेदभाव ‘विनम्र’ (‘polite’), मगर लगातार तरीक़े से क़ायम है। और इसके कारण एससी/एसटी पृष्ठभूमि के छात्रों के साथ ‘परायों’ (‘other’) की तरह व्यवहार किया जाता है। उन्होंने बताया कि महामारी के दौरान ऑनलाइन क्लासों में शामिल होने में, आदिवासी इलाक़ों से आने वाले उनके छात्रों को किस हद तक तकनिकी और आर्थिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। शुभजित का यह भी कहना था कि विश्वविद्यालयों में अड्मिशन के समय, वंचित जातियों के छात्रों को लिखित परीक्षा में शानदार अंक लाने के बावजूद, इंटरव्यू में बहुत कम अंक दिए जाते हैं। पीएचडी स्कॉलर और ‘दलित वीमेन फाइट’ की संस्थापक रिया सिंह ने कहा कि इसे विडंबना ही कहेंगे कि उनको ऐसे असाइनमेंट में कम नंबर मिले थे जहां छात्रों को अपने जातिगत अनुभवों पर लिखने के लिए कहा गया था। उन्होंने ऐसी घटनाओं का भी हवाला दिया जिससे साबित होता है कि तथाकथित उदारवादी और प्रगतिशील संस्थानों में भी वंचित जातियों के छात्रों को लगातार निरुत्साहित किया जाता है। पीएचडी स्कॉलर और आईआईटी बॉम्बे के APPSC के सदस्य तेजेन्द्र प्रताप गौतम ने (विश्वविद्यालय) प्रशासन के पाखंड को रेखांकित करते हुए कहा कि वे सवर्ण हिन्दुओं को धूम धाम से अपने त्योहारों को मनाने की खुली छूट देते हैं। पर जब वंचित जातियों के छात्र एक साथ मिलकर जाति-विरोधी आंदोलन से सम्बंधित लेक्चर (lecture) आयोजित करते हैं तब उनके रास्ते में तरह तरह की रुकावटें पैदा की जाती हैं।  

 

दिल्ली विश्वविद्यालय की अध्यापिका रेहनामूल रवींद्रन ने कहा कि आरक्षण प्रतिनिधित्व और रोज़गार निर्माण से आगे बढ़कर और भी कई क्षेत्रों में बदलाव लाया सकता है—“आरक्षण से संस्थाओं की संरचना या पूरा ‘ऐकडेमिक एनवायरनमेंट’ (academic environment) ही ज़्यादा लोकतांत्रिक बनता है। हमें समावेशी प्रतिनिधित्व (inclusive representation) की ज़रुरत है, जिसमें दलित-बहुजन लोग प्रशासनिक और प्रभावशाली पदों पर नियुक्त हों। इससे उन जगहों में दलित-बहुजन छात्रों के लिए रहने-योग्य और अनुकूल वातावरण पैदा होगा।”  सैद्धांतिक तौर पर आरक्षण की नीति मौजूद होने के बावजूद, शीर्ष शिक्षण संस्थानों ने लगातार उसका उल्लंघन किया है। उदाहरण स्वरूप, 2020 में आईआईटी दिल्ली के 31 विभागों में से 15 विभागों ने और आईआईटी बॉम्बे के 26 विभागों में से 16 विभागों ने एक भी एससी विद्यार्थी को पीएचडी प्रोग्राम में दाख़िला नहीं दिया।  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और युओएच (हैदराबाद विश्वविद्यालय) जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी आरक्षण नीति का उल्लंघन किया जाता है। एक संसदीय समिति ने भी जांच के बाद पाया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में ओबीसी (अन्य पिछड़े वर्ग) पृष्ठभूमि से सिर्फ़ 4% अध्यापक ही नियुक्त हैं। हालांकि आरक्षण नीति के अनुसार, 27% अध्यापक (faculty) पद ओबीसी लोगों के लिए आरक्षित होने चाहिए। और भी, उन 4% अध्यापकों में से एक भी अध्यापक असोशिएट प्रोफेसर या प्रोफेसर पद पर नियुक्त नहीं हैं।      

 

1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक़ आरक्षण लागू होते ही देशभर में विरोध की लहर बह गई, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालयों के छात्र भी शामिल थे। डीयू के विद्यार्थी राजीव गोस्वामी ने मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों के विरोध में आत्मदाह कर लिया |  2006 में इतिहास ने खुद को दोहराया— जब तत्कालीन भारत सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी छात्रों के लिए आरक्षण लागू करने की कोशिश की, तो इस क़दम के ख़िलाफ़ एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) और आईआईटीओं के विद्यार्थिओं और अध्यापकों ने देशभर में विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया। 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आरक्षण को बरक़रार रखा, हालांकि कोर्ट ने ओबीसी के नवोन्नत वर्ग यानी ‘creamy layer’ (जिनकी पारिवारिक आय 4.5 लाख़ से ऊपर हो) को आरक्षण से बाहर कर दिया। 2007 में यूजीसी (University Grants Commission) के तत्कालीन अध्यक्ष सुखदेव थोराट के नेतृत्व में बनाई गयी एक समिति ने जातिगत भेदभाव की जाँच की। थोराट कमेटी की रिपोर्ट में, एम्स में भेदभाव मिटाने के संबंध में कई सिफ़ारिशें की गयी थी—जैसे कि समान अवसर या ‘इक्वल ओपोर्चुनिटी’ सेलों (equal opportunity cells) की स्थापना और स्वास्थ्य मंत्रालय की देख-रेख में एम्स में आरक्षण नीति पर अमल। हम आज तक थोराट कमेटी के सिफारिशों के लागू होने के इंतज़ार में हैं। और आरक्षित श्रेणिओं के विद्यार्थी लगातार भेदभाव और अपमान से जूझे जा रहे हैं।     

 

किन कारणों ने हमारे शीर्ष संस्थानों में जातिवाद को जीवित रखा है?

 

भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों में आज भी जाति और जातिवाद क्यों पनप रहा है? जैसे कि तेजेन्द्र और शुभजित ने हमें याद दिलाया, आंबेडकर ने कहा था “शिक्षित करो, संगठित करो और संघर्ष करो”, मगर ऐकडेमिक स्थानों और ज्ञान में सवर्णों द्वारा की गयी ‘gatekeeping’ यह सुनिश्चित करती है कि वंचित जातियों के छात्र मुक्ति के मार्ग में पहला क़दम, यानी शिक्षा, भी हासिल नहीं कर सकते।    

 

पैनेलिस्टों ने उन विभिन्न पद्धतियों पर रौशनी डाली, जिनके माध्यम से उच्च शिक्षण संस्थानों के कैंपसों में इस तरह की ‘gatekeeping’ की जाती है। मोटे तौर पर वे तीन प्रकार के होते हैं, हालांकि उनके जातिवाद को बनाए रखने के तरीक़े बहुत भिन्न हो सकती हैं। पहली पद्धति भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों के कैंपसों में ‘depolicitisation’ का बढ़ता रुझान है। दूसरी, उच्च शिक्षण संस्थानों में वंचित जातियों का अप्रतिनिधित्व (low representation)। और तीसरी, सवर्ण स्कॉलरों का ज्ञान उत्पादन और वितरण के साधनों (means of knowledge production and dissemination) पर सख़्त नियंत्रण।   

 

रेहनामूल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कैंपसों का ‘depoliticisation’ जातिवाद को क़ायम रखता है। यह प्रक्रिया ख़ासकर आईआईटी जैसे एलीट संस्थानों में नज़र आती है, जहां छात्रों को किसी भी तरह के राजनीतिक संगठन में हिस्सा लेने से वर्जित किया जाता है। कैंपस पर राजनीति में सक्रिय छात्रों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दी जाती हैं, और राजनीति से दूर रहने वाले छात्रों से तरक़्क़ी के वादे किये जाते हैं | यह भी याद रखना चाहिए कि विश्वविद्यालय प्रशासन अक्सर हाशिए के समुदायों के विद्यार्थीओं को सज़ा का निशाना बनाता है| रेहनामूल का कहना है कि “आईआईटीओं में पढ़ने वाले दलित-बहुजन छात्रों के पास ऐसी कोई जगह नहीं होती जहाँ से उन्हें राहत या सहायता मिल सके—ऐसे में उनके पास आत्महत्या करने या ड्रॉप-आउट करने के अलावा कोई चारा नहीं होता। हमारे अपने समुदायों के छात्रों के बीच एकता पैदा करने के लिए भारतीय कैंपसों में दलित-बहुजन संगठनों की ज़रूरत है—ताकि वे एकजुट होकर अपनी समस्यांओं का समाधान कर सकें और हर चुनौती को व्यक्तिगत रूप से न लें।”

 

वैज्ञानिक और विज्ञान-प्रधान शिक्षा संस्थानों में स्थिति और भी गंभीर है। स्वतंत्र रिसर्चर रेचल भारती चंद्रन ने कहा कि अगर विज्ञान के छात्र जातिवादी अध्यापकों पर आरोप लगाते हैं, तो उनका करियर ख़त्म हो सकता है। इसका कारण यह है कि वैज्ञानिक समुदाय के लोग आपस में कसकर बंधे होते हैं। और विज्ञान एक अध्ययन-क्षेत्र (discipline) के तौर पर बेरहम माना जाता है। ऊपर से, विज्ञान ख़ुद को एक वस्तुनिष्ठ (objective) विषय मानता है, जो सिर्फ़ योग्यता (merit) और श्रेष्ठता (excellence) के मनमाने मापदंड पर आधारित है। इससे मामला और भी उलझ जाता है। जनता के विचार में, विज्ञान पर राजनीति का प्रभाव पड़ ही नहीं सकता—शायद यही कारण है कि 2006 के आरक्षण के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों में वैज्ञानिक संस्थानों के छात्रों ने सब से आगे बढ़कर हिस्सा लिया था। मसलन, आईआईटी रूरकी के 2500 छात्रों ने आरक्षण के ख़िलाफ़ एक रेसोलुशन पर हस्ताक्षर किये थे। असल में विज्ञान सामाजिक और राजनीतिक पूर्वाग्रहों (biases) से बिलकुल भी मुक्त नहीं है। कई लोगों के शोध-कार्य से पता चला है कि आईआईटी और आईआईएससी जैसे वैज्ञानिक संस्थान जाति और जातिवाद पर पनपते हैं।     

 

‘Gatekeeping’ का दूसरा तंत्र उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में वंचित जातियों के लोगों के प्रतिनिधित्व से संबंधित है। इस बात पर कोई बहस नहीं हो सकती है कि भारत की उच्च शिक्षण संस्थानों में सवर्णों का अति-प्रतिनिधित्व (over-representation) है। पत्रकार दिलीप मंडल ने ज़ोर देकर कहा कि वंचित जातियों के छात्रों का एक छोटा अंश आज कक्षाओं में मौजूद हो सकता है, लेकिन स्टाफ रूम में अभी भी सवर्णों का वर्चस्व है (domination)। TheWire.in की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि आईआईटीओं में सभी अध्यापकों में से 3% से कम आरक्षित श्रेणियों से हैं।    

 

कैंपसों में सवर्णों के इस अत्यधिक वर्चस्व (dominance) का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। यह सवर्ण लोगों में एक ‘impunity’ पैदा करता है—वे जानते हैं कि उन्हें उनके जातिवादी व्यवहार के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा। इसी वजह से सीमा सिंह जैसी अध्यापिका बिना किसी झिझक के कक्षे में जो चाहे कर सकती हैं और कह सकती हैं। वे वीडियो पर घमंड के साथ दावा करती हैं कि उन्हें कोई छू भी नहीं सकता, यहाँ तक कि (उनके अपने शब्दों में) ‘माइनॉरिटी कमीशन’ भी नहीं। कैंपसों में जातिगत भेदभाव के कथित मामलों की जांच करने या उनसे निपटने के लिए स्थापित ‘इक्वल ओपोर्चुनिटी सेल्स’ (equal opportunity cell) की संरचना भी सवर्णों के वर्चस्व से प्रभावित होती है। इसके अलावा, जैसा कि मेकपीस और युओएच की पीएचडी स्कॉलर शालिनी महादेव ने बताया, वंचित जातियों के लोगों को यह ‘साबित’ करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है कि उनके साथ हुए भेदभाव वाक़ई जातिगत भेदभाव है। इसलिए यह पूरी प्रक्रिया बेहद धीमी और ट्रॉमेटाइज़िंग (traumatising ) होती है। ऊपर से, ऐसी (जांच) समितियों की संरचना और उनकी रिपोर्ट शायद ही कभी सार्वजनिक की जाती हैं। यहाँ तक कि आईआईटी-केजीपी के मामले में भी संस्थान सीमा सिंह की घटना की जांच कर रही समिति के गठन पर ख़ामोश है।

 

‘Merit’ या योग्यता की तथकथित धारणा तीसरी पद्धति है, जिसके ज़रिये उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवाद को बनाए रखा जाता है। ‘Merit’ की धारणा इस बात पर हठधर्मिता (dogma) पैदा करती है कि कौन किस प्रकार के ज्ञान का उत्पादन और प्रसार कर सकता है। ज़्यादातर लोगों का मानना है कि आरक्षण नीति संस्थाओं की ‘meritocracy’ को कमज़ोर करती है। वे यह नहीं देखते हैं कि आरक्षण जैसी सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) वंचित जातियों के लोगों को शिक्षा और रोज़गार तक पहुंचने में मदद करती है। इस बात के ठोस सबूत और तर्क हैं कि ‘merit’ अपने आप में एक मनमाना, पक्षपाती और भेदभावपूर्ण (discriminatory) मापदंड है। लेकिन आमतौर पर इस बात को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वैशाली के मुताबिक़, किसी दलित स्कॉलर की योग्यता पर शक करना (“questioning merit of a Dalit scholar”), लोगों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष जातिवादी सोच को दर्शाता है। और इस तरह की धारणाओं के ज़रिये भारतीय शिक्षा में जाति-विरोधी स्कॉलरशिप को epistemic और systemic रूप से मिटा दिया गया है। इसका एक ज्वलंत उदाहरण यह है कि आंबेडकर की मौलिक और क्रांतिकारी रचनाएँ—जो आज भी प्रासंगिक हैं—मौजूद होने के बावजूद, आधुनिक भारत के निर्माण में उनकी भूमिका को ‘भारतीय संविधान के जनक’ होने तक ही सिमित किया जाता है। वैशाली ने इस बात पर ज़ोर डाला कि वंचित जातियों के छात्रों के लिए जाति-विरोधी रचनाओं पर चर्चा करना महत्त्वपूर्ण है। इस तरह की बातचीत से उन्हें मदद मिलती है। युओएच के छात्र और आंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन (ASA) के महासचिव (इन-चार्ज) प्रज्वल गायकवाड़ ने यह भी कहा कि वंचित जातियों के छात्रों को जानबूझकर उन विषयों और स्कॉलरशिप्स के साथ ऐकडेमिक रूप से संलग्न होने से निरुत्साहित किया जाता है, जो जाति से संबंधित नहीं हैं। इस तरह की ज्ञान की ‘gatekeeping’ वंचित जातियों के छात्रों के अन्य विषयों में योगदान करने की क्षमता (potential) को सीमित करती है। और इससे यह स्टीरियोटाइप और मज़बूत हो जाता है कि वंचित जातियों के छात्र सिर्फ़ जाति के विषय पर ही बोलने और लिखने के क़ाबिल हैं।  

 

सभी पैनलिस्ट इस बात पर भी सहमत हुए कि कैंपस में छात्रों को जातिगत भेदभाव से बचाने और ऐसे मामलों में सज़ा दिलाने के लिए क़ानून (legislation) और विधिशास्त्र (jurisprudence) दोनों का अभाव है। इसी कमी को पूरा करने के लिए रोहित की मौत के बाद वंचित जातियों के छात्रों ने ‘रोहित एक्ट’ की मांग उठाई थी। वे ऐसे समुदायों के छात्रों की मुक्ति के मुद्दे पर शिक्षण संस्थानों द्वारा दिखाई गई बेपरवाही से बिलकुल नाख़ुश थे। इसका एक प्रमुख उदाहरण आईआईटीओं में पढ़ाया जाने वाला एक साल का प्रीपेरेटरी कोर्स है, जो अब सीमा सिंह की घटना के बाद सुर्ख़ियों में आया है। मेकपीस के मुताबिक़, इन प्रीपेरेटरी क्लासों को वंचित जातियों के छात्रों की मदद करने के लिए नहीं बनाया गया है, बल्कि वे सिर्फ़ सवर्णों को उनकी अपनी उदारता का एहसास दिलाते हैं—असल में यह एक ‘self-serving (ख़ुदग़र्ज़) act’ है। मेकपीस की सिफ़ारिश है कि कोर्स की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए छात्रों के पाठ्यक्रम की शुरुआत और अंत में मूल्यांकन किया जाना चाहिए (baseline and endline assessment) |    

 

“हम यहाँ मरने नहीं आये हैं”आगे का रास्ता  

 

वेबिनार के दौरान शालिनी ने एक बात कही, जिसका सभी पर गहरा प्रभाव पड़ा—“हम यहाँ मरने नहीं आये हैं।” उन्होंने और बाक़ी पैनेलिस्टों ने परिस्थिति को सुधारने के कुछ तरीक़े सुझाए, जिनका सारांश नीचे दिया गया है।   

 

  1.  कैंपसों में अधिक बहुजन नेटवर्क बनाने की ज़रुरत है, ताकि बहुजन छात्रों में एकता, सहायता और सशक्तिकरण (empowerment) बढ़े। बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स असोसिएशन (BAPSA), ASA या APPSC जैसे छात्र संगठन न सिर्फ़ वंचित जातियों के छात्रों के अधिकारों के लिए लड़ते हैं, बल्कि वे अपने आप में महत्वपूर्ण ‘spaces’ हैं जहां इन छात्रों को एकता और सहायता मिलती है।
  2.  बड़े पैमाने पर आरक्षण नीति लागू करने पर पहले से अधिक ध्यान देना चाहिए। 
  3. विश्वविद्यालय कैंपसों में जातिगत भेदभाव और शोषण की शिकायतों से निपटने के लिए क़ानूनी और प्रशासनिक तंत्र (legal and administrative mechanisms) बनाने की ज़रुरत है। इस सन्दर्भ में ‘रोहित एक्ट’ का सूत्रीकरण (formulation) और लागू होना बहुत ज़रूरी है। वंचित जातियों के छात्रों को समान अवसर मुहैया करवाने के लिए विशेष सेल (Equal Opportunity Cells) बनाने चाहिए। और वंचित जातियों की पृष्ठभूमि से आने वाले अफ़सरों को उनके कामकाज की निगरानी के लिए नियुक्त किया जाना चाहिए।   
  4. वंचित जातियों के लोगों को और अधिक राजनीतिक शक्ति जुटाने की ज़रूरत है। आंबेडकरवादी, पेरियारवादी और फुलेवादी विचारधाराओं का पालन करने वाले राजनीतिक दलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  5. उच्च शिक्षा के स्थानों में जाति और जातिवाद के बारे में बातचीत को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।  
  6. वंचित समुदायों के छात्रों की मौत का इंतज़ार किए बिना, मास-मीडिआ और पत्रकारों को जाति और जातिवाद के बारे में पहले से रिपोर्ट करने पर ध्यान देना चाहिए।  
  7. एससी/एसटी/ओबीसी सेलों (SC/ST/OBC cells) की स्थापना की जानी चाहिए। ये सेल्स पूरी तरह से वंचित जातियों के लोगों से बने होने चाहिए।   
  8. अलग अलग हाशिए के समुदायों के बीच एकजुटता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  9. वैश्विक (global) स्तर पर एकजुटता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जाति और जातिवाद के मुद्दों को हमें अंतर्राष्ट्रीय मंच पर लाना होगा, ताकि हमें वैश्विक समर्थन (global support) मिल सके।     
  10. सवर्ण लोगों को गंभीर रूप से अपने विशेषाधिकारों की जांच करनी चाहिए और उन पर सवाल उठाने चाहिए । हालाँकि सवर्ण लोगों ने जाति और जातिवाद पर बहुत शोध किया है, पर समय आ गया है कि वे अपने ख़ुद के ‘सवर्ण-ता’ (Savarnality) का सूक्ष्म मूल्यांकन करें।     

 

अभिस्वीकृति:  

इस रिपोर्ट को लिखने में बिशाल कुमार दे, शालिनी महादेव, प्रज्वल गायकवाड़ और वैशाली खांडेकर के साथ बातचीत की अहम भूमिका रही है। लेखक उनका आभारी हैं। 

अपेंडिक्स:

  1. वेबिनार का एक मल्टीमीडिया ट्रांसक्रिप्ट तैय्यार किया जा रहा है, जिसे आप इधर देख सकते हैं।

सवाल-जवाब 

समय की कमी के कारण, हम वेबिनार के अंत में श्रोताओं के सवालों के जवाब नहीं दे सके। नीचे उनमें से कुछ सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई है।

‘रोहित एक्ट’ अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Prevention of Atrocities Act) से कैसे अलग है? ‘रोहित एक्ट’ में क्या प्रावधान हैं जो PoA में कुछ नया जोड़ते हैं? संस्थानों में सवर्णों का ही वर्चस्व है—ऐसे हालात में हम कैसे सुनिश्चित करें कि ‘रोहित एक्ट’ न्याय की भावना (spirit of justice) से लागू हो?   

रेहनामूल रवींद्रन: ‘रोहित वेमुला एक्ट’ PoA एक्ट से अलग इसलिए है क्यूंकि वह ख़ास कर शिक्षण संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न से निपटने के लिए रचा गया है। PoA एक्ट का दायरा उससे बड़ा है—वह किसी ख़ास सार्वजनिक स्थान तक सीमित नहीं है। ‘रोहित वेमुला एक्ट’ को कारगर रूप से लागू करने में हमें PoA एक्ट जैसी ही चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उन चुनौतियों के बावजूद, जातिगत अत्याचारों को रोकने में PoA एक्ट कुछ हद तक सफल साबित हुआ है। उसी तरह, संस्थानों में सवर्णों के वर्चस्व के बावजूद, ‘रोहित वेमुला एक्ट’ सफल हो सकता है, क्यूंकि वह सवर्ण शिक्षकों द्वारा किये गए उत्पीड़न और भेदभाव को दंडित (penalize) करता है।          

 

एससी/एसटी श्रेणीयों के कई छात्रों के साक्षात्कार से उभरने वाले मुद्दों में से प्रमुख है उनके सहपाठियों और सहकर्मियों की असंवेदनशीलता (insensitivity) | उन्होंने कहा कि उनके ‘उंची’ जाति के सहकर्मियों को ‘sensitize’ करना बहुत ज़रूरी है, ताकि वे जाति के मुद्दे के प्रति जागरूक हों और समझें कि किस तरह का व्यवहार ‘casual discrimination’ माना जाता है। शिक्षण संस्थान इस तरह के ‘sensitisation drives’ को अपनी कार्य-पद्धति में कैसे शामिल कर सकते हैं?        

रेहनामूल रवींद्रन: शिक्षण संस्थानों में लिंग और जाति के विषयों पर बातचीत शुरू करना बहुत ज़रूरी है। जाति और लिंग के मुद्दों पर चुप्पी बनाये रखने से भेदभाव की बीमारी और भी गंभीर हो जाती है। सामान्य तौर पर कक्षाओं के अंदर बहुत कम जाति और लिंग के binaries ‘अनलर्न’ (unlearn) होते हैं। कक्षाओं में लिंग और जाति पर चर्चा अनिवार्य (compulsory) की जानी चाहिए। और कक्षा के बाहर संस्थानों, छात्र स्टडी ग्रुप्स और छात्र संगठनों को ऐसी चर्चाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए। 

 

संस्थागत हत्याओं पर कैसे अंकुश लगाया जा सकता है? अल्पसंख्यक और पिछड़े समुदायों के लिए भारतीय संस्थाओं को कैसे समावेशी (inclusive) बनाया जा सकता है?  

प्रज्वल गायकवाड़: लगभग सभी संस्थागत हत्याओं से यही पता चलता है कि कैसे हाशिए के छात्रों को संस्थाओं द्वारा किसी भी सहायता से वंचित किया गया है। बल्कि वे सब (संस्थाएं) मिलकर यही कोशिश करती हैं कि इस तरह के कार्यों को ‘जाति हिंसा’ का नाम नहीं दिया जाये, और लगातार उत्पीड़ित छात्रों को redressal (निवारण) के रास्तों से बाहर रखा जाये। ऐसी स्थिति में, हाशिये के छात्र अकेलेपन में धकेल दिए जाते हैं। संस्थाएं तब तक इंतज़ार करती हैं जब तक वे संस्थाओं से ख़ुद को मिटा नहीं देते, या तो ड्रॉप-आउट होकर या मारे जाकर। उच्च शिक्षण संस्थानों में हाशिए के वर्गों के शिक्षकों और कर्मचारियों का अनुपात भी काफ़ी कम है। क्यूंकि ‘उंची’ जाति के लोग शक्तिशाली पदों पर हैं, इसलिए उनकी ‘gatekeeping’ और जातिगत एकजुटता (caste solidarities) को चुनौती देने वाला कोई होता नहीं है। इसलिए हमें सुनिश्चित करना पड़ेगा कि आरक्षण नीति ठीक से लागू की जाये। हालांकि हाशिये के छात्रों को उन संस्थाओं पर निर्भर होना पड़ता है जो अनिवार्य रूप से जातिवादी हैं, मगर उनको स्टडी सर्कल, छात्र संगठन इत्यादि में संगठित होकर ‘pressure groups’ की भूमिका निभानी होगी, और यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी हाशिये का छात्र कैंपस समुदाय से बाहर नहीं रहे (excluded)। 

 

हर तरफ़ साफ़ नज़र आता है कि ज़्यादातर मुख्य पदों पर ‘उंची’ जाति के लोगों का क़ब्ज़ा है, जैसे कि हाई कोर्ट के जज, सुप्रीम कोर्ट के जज, बैंकों के राज्य्पाल और उप राज्यपाल। शिक्षण संस्थानों में भी यही हाल है। क्या संविधान के अनुच्छेद 16 के अनुसार पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान सफल रहा है?  

प्रज्वल गायकवाड़: सवर्ण हिन्दुओं ने हमेशा से ‘पदोन्नति’ के मुद्दे को वंचित जातियों को शक्तिशाली पदों से दूर रखने का ज़रिया बनाया है। सभी राज्यों के सचिवालयों पर एक नज़र डालने से साफ़ पता चलता है कि हर सचिवालय में एससी/एसटी नौकरशाहों की संख्या आरक्षित पदों तक ही सीमित है। और उन्हें ऐसे पदों पर नियुक्त किया जाता है, जो उन्हें समाज में बदलाव लाने का मौक़ा नहीं देते। पदोन्नति में आरक्षण न होने की हालत में यह कहना मुश्किल है कि सवर्ण हिन्दू कभी वंचित समुदायों को इतने शक्तिशाली पद हासिल करने भी देते या नहीं। पदोन्नति में आरक्षण पर ब्राह्मणवादी ताकतों का बढ़ता हमला यही दर्शाता है कि यह प्रावधान उनके आधिपत्य (hegemony) के लिए एक चुनौती के रूप में खड़ा है। 

 

मैं एक सवर्ण परिवार से हूँ, और मेरे लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि इस पूरे (जाति-विरोधी) संघर्ष में मेरी क्या भूमिका है? ख़ास कर शिक्षा जगत में “सवर्णों के अति-प्रतिनिधित्व (over-representation)”  के बारे में आपने जो कहा है, उसके संदर्भ में मेरी भूमिका क्या हो सकती है? पैनेलिस्टों के ख़याल में, जाति-विरोधी संघर्ष में हो रही प्रगति उच्च शिक्षण संस्थानों की इस समस्या के बारे में सोचने की तरफ़ क्या काम कर सकती है? और इस संघर्ष में सवर्ण लोगों का क्या स्थान होगा? मुझे पता है कि ये आसान सवाल नहीं हैं, लेकिन आप सब के विचार सुनकर वाक़ई मदद मिलेगी।        

प्रज्वल गायकवाड़: बड़े दुख की बात है कि अधिकांश ‘उंची’ जाति के लोग जो हाशिए के समुदायों के संघर्ष में शामिल होना चाहते हैं, वे अपने ख़ुद के संघर्ष को भूल जाते हैं—यानी अपने ही समुदाय के लोगों की अमानवीय जाति प्रथा के ख़िलाफ संघर्ष। हालांकि कई स्कॉलर्स वंचित जातियों के लोगों पर ही शोध करना चाहते हैं, मगर क्यों ना तथाकथित ‘उंची’ जाति के लोगों पर भी शोध किया जाये? जो लोग तर्कहीन प्रथाओं (irrational practices) में विश्वास करते हैं और जिन्हें बिना किसी योग्यता के इतने विशेषाधिकारों का लाभ मिलता है? ब्राह्मण परिवारों और उनके जातिवादी और पितृसत्तात्मक प्रथाओं पर ज़्यादा शोध क्यों नहीं किया जाता है? सवर्ण लोग किसी भी हाशिये के समुदाय के संघर्ष में बाहरी (outsiders) हैसियत रखते हैं, जो ज़्यादातर समय हमारे संघर्ष को या तो appropriate या dilute करते हैं। मेरी राय में सवर्ण लोग ‘सहानुभूति’ का जो रवैया अपनाते हैं, वही उनका सबसे बड़ा दोष है। यह रवैया सामाजिक स्थितिओं के असमानता (uneven social locations) से ही पैदा होता है। सवर्णों के शोध-कार्य में उनके करियर को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा ‘जाति’ का विषय का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन उन्होंने उत्पीड़कों के रूप में अपनी भूमिका पर जानबूझकर चुप्पी साधे रखी है। इससे हर सवर्ण ‘ally’ को समझना चाहिए कि समुदाय-निर्माण (community-building) की प्रक्रिया में उनकी भूमिका बहुत सीमित है। बल्कि, उन्हें अपने विशेषाधिकारों की मदद से, संसाधनों (resources) के साथ हमारे आन्दोलनों को समर्थन करना चाहिए। उन्हें अपनी ख़ुद की जाति प्रथाओं को स्वीकार (acknowledge) करना चाहिए और अपने समुदाय के लोगों को उन प्रथाओं को ‘unlearn’ करने के लिए संगठित करना चाहिए!

 

जेएनयू कैंपस में मैंने ब्राह्मण छात्रों को एबीवीपी के समर्थन में एकजुट होते देखा है, हालांकि वे ख़ुद को ‘लिबेरल’ (उदारवादी) कहते हैं। वामपंथी दलों में निर्णय लेने के स्तर पर सवर्णों का वर्चस्व (domination) है और दलित छात्रों को सिर्फ़ ‘tokenism’ के तौर पे कुछ पद दिए जाते हैं। इसके बावजूद मैंने दलितों को BAPSA को पूरी तरह से समर्थन देने के बजाय कुछ हद तक वाम दलों का समर्थन करते देखा है। इसलिए मुझे लगता है कि एक बड़े राजनीतिक bargain के लिए एकजुट होने की आवश्यकता पर बहुजनों का राजनीतिकरण करना (politicize) ज़रूरी है। इस मुद्दे पर पैनेसलिस्टों के क्या विचार हैं?            

प्रज्वल गायकवाड़: तथकथित ‘ऊंची’ जाति के लोग विचारधाराओं की परवाह किए बिना ख़ुद को किसी भी दल में संगठित कर सकते हैं । हालांकि यह अफ़सोसजनक है कि ऐसे संगठनों के खुले जातिवादी चरित्र के बावजूद दलित छात्र उन से जुड़ते हैं, लेकिन हमारी राजनीति ख़ुद के एहसास (self-realisation) पर आधारित है। चूँकि हम एकेडेमिया का हिस्सा हैं, हमारी भूमिका प्रतिरोध की ख़ुद की भाषा बनाने की होनी चाहिए। और हमें जातिवादी समाज (जिसमें सवर्ण हिन्दुओं के ये संगठन शामिल हैं) द्वारा किए जा रहे प्रणालीगत (systemic) जाति उत्पीड़न पर अधिक से अधिक discourse पैदा करना चाहिए। 

 

रीडिंग लिस्ट

  1. बी आर आंबेडकर की रचनाएं और भाषण— https://velivada.com/2020/02/29/pdf-40-volumes-of-babasaheb-ambedkars-writings-speeches-books-hindi/ 
  2. स्कॉलर, लेखक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े के साथ एक साक्षात्कार— https://issuesofconcern.in/articles/caste-in-india-evolution-and-manifestation-an-interview-with-prof-anand-teltumbde 
  3. आईआईटीओं में वंचित जातियों के छात्रों के अन्यीकरण (othering) के विषय पर ‘Coming out as Dalit’ की लेखिका यशिका दत्त का एक लेख— https://theprint.in/pageturner/excerpt/the-iits-have-a-long-history-of-systematically-othering-dalit-students/193284/ 
  4. रेनी थॉमस का शोध, जो आईआईएससी में जाति और जातिवाद को डॉक्यूमेंट करता है— https://journals.sagepub.com/doi/abs/10.1177/0963662520903690 
  5. एकेडेमिया में दलित अनुभवों की ‘museumization’ को लेकर वैशाली खांडेकर और शालिनी महादेव के बीच बातचीत— https://thelifeofscience.com/2020/11/12/museumization-dalit-experience/ 
  6. आईआईटी मद्रास में जाति और जातिवाद के विषय पर अजंता सुब्रमण्यम का लेख— https://openthemagazine.com/essays/open-essay/an-anatomy-of-the-caste-culture-at-iit-madras/ 

 

संपादकीय टिप्पणी:

इस लेख का पिछला संस्करण ‘द वायर साइंस’ के संपादक वासुदेवन मुकुंथ द्वारा संपादित और TheWire.in पर प्रकाशित किया गया था।

About the author(s)
Sayantan Datta
Sayantan Datta

Sayantan (they/them) is a queer-trans science writer, journalist and communicator.